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घोषणा पत्र (चुनाव पर कविता)

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मुद्दा, घोषणा पत्र (चुनाव पर कविता)  मुद्दा  चेहरा अधूरा मौसम चुनावी भाषणों का प्रदूषण घटिया गद्य के नमूने निर्मोही घोषणा पत्र   अदब की बात मत कर इल्म इस बात का मत कर संसद का ये शून्यकाल सत्र बगल में दबाये खलीफाओं के पत्र ख़ौफ़ज़दा  बादल पूरा मौसम बेईमानी तुफानो का संप्रेषण उखड़े हुए गलियारे सुने आँधियों का घोषणा पत्र ईमान की ज़हनी मुलाक़ात मत कर कील पत्थरों का व्यापार बंद कर प्रकृति का अघोषित घटनाचक्र लाल खून पे सफेद गोलचक्र इंसां खुदा पूरा सब अनजानी सब मौन चरित्र अपहरण सोयी धरा कि धड़कन सुने निर्मोही घोषणा पत्र             -    सोमेन्द्र सिंह 'सोम'

थोड़ा तो हिंदुस्तान मानता होगा (गज़ल)( hindi kavita on majdur)(मज़दूर ग़ज़ल)

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कविता, ग़ज़ल, मजदूरों पर ग़ज़ल, जिंदगी पर हिंदी कविता, hindi kavita on life, life poem, life poetry, jindgi ki hakikat, jindgi par hindi kavita संकट की इस घड़ी में जब सारे देशवासी एकजुट होकर महामारी से लड़ने का प्रयास कर रहे थे । तभी कुछ लोग अपनी सामान्य जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हो गए तथा वे खाने की तलाश में, अपने बच्चों को  भूखमरी से बचाने के लिए वापिस अपने राज्य, अपने शहर, अपने गांव को लौटने लगे।  हमने भारत का सबसे बड़ा अंतरराज्यीय पलायन होते देखा। आजादी के बाद का सबसे बड़ा पलायन हुआ।  बहुत से लोगों ने इनकी सहायता की तथा इनको अपने स्थान तक सकुशल पहुंचाने में मदद की। परंतु सियासतदारो का एक तबगा फिर भी राजनीति से बाज नहीं आया और सारी गलती इस हिंदुस्तान पर डाल दी जो दो वक्त की रोटी के लिए सड़कों पर निकल पड़ा था। इन्ही सियासतदारों की हकीकत को बयां करने का प्रयास करती एक कविता। हिंदुस्तान मानता होगा(ज़िन्दगी पर हिंदी कविता, मजदूरों पर ग़ज़ल) वो जब भी खुद के अंदर झाँकता होगा खुद की तस्वीर देखकर काँपता होगा मैं आईना तो नहीं, छाँव भर हुँ वह मुझे थोड़ा तो हिंदुस्तान मानता होगा तू...

शहर को रोते देखा(hindi kavita, gazal in hindi))

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शहर को रोते देखा (ग़ज़ल, हिंदी कविता) Hindi kavita, gazal in hindi and english font शहर के हाथों शहर की फितरत को खोते देखा बसन्त चाँदनी में शहर को रोते देखा ताजमहल को गढ़ने वाले उन हाथों को आज फिर रोटी के लिए तरसते देखा नया संकल्प नया वक़्त नया आसमां देखा हमनें हाइवे से उतरते हिन्दोस्तां को देखा दो वक़्त की रोटी के लिए आए थे शहरों में दो वक़्त की रोटी के लिए गाँवों की ओर लौटते देखा हे शहरवासियों बचा लो अपने शहरों को 'सोम' ने तो धरा को भी बदलते देखा      shahar ke hathon shahar ki fitarat ko khote dekha  basant chandani mein shahar ko rote dekha tajamahal ko gadhane vale un hathon ko  aaj phir roti ke liye tarasate dekha  naya sankalp naya vaqt naya aasaman dekha  hamane highway se utarate hindustan ko dekha  do vaqt ki roti ke lie aae the shaharo mein do vaqt ki roti ke liye ganvon ki or lautate dekha  he shaharvasiyon bacha lo apane shaharo ko 'som' ne to dhara ko bhi badalate dekha  - सोमेन्द्र सिंह 'सोम'

विधायक के घर कविता मंचन(chunavi kavita)

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Chunav par kavita, chunavi sayari A poem that tries to show the reality of the society, in which the distinction between the words and actions of the leaders is told. एक कविता जो समाज की वास्तविकता को दिखाने की कोशिश करती है, जिसमें नेताओं के शब्दों और कार्यों के बीच का अंतर बताया गया है।  कविता जीवन पर, मेरी जिंदगी कविता, परेशानी पर कविता, नेताओं पर कविता, चुनावी कविता नेताओं पर कविता तड़पते समाज की रूपरेखा बन रही है विस्की के प्यालो में आज विधायक के घर कविता का मंचन हुआ कुछ ठहाके लगे होंगे कुछ बेवक़्त रोये होंगे कुछ गोश्त के टुकड़ों पे विस्की डाले सोये होंगे सुबह एक किसान के मरने की खबर छपी अखबार पे रख बिस्किट का टुकड़ा कुत्ते को डाला होगा फिर मोर्निंग वॉक पे जाते सामने गली के मैनहोल में नंगे बदन, तुम्हारी गंदगी से लथपथ जिस्म लिए उस लड़के को बिना सुरक्षा के उतारा होगा तुम्हारे साथ खड़े वो चार अफसर, उनको संविधान का पाठ पढ़ाया होगा उस बच्ची की घटनाओं को जातीय जामा पहनाकर उस भीड़ में उस पीपल के पेड़ पर कितनी आसानी से लटकाया होगा वो संविधान जिसकी शपथ ली थी कल तुमने उसकी सुरक्षा, उस पुल...

इंसान बनना बाकी है(hindi kavita on life)

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Hindi kavita on life, hindi kavita, hindi kavita on love, हिंदी कविता, हिंदी कविता संग्रह, हिंदी कवितायें, हिंदी कविता प्रकृति (इंसानी), ग़ज़ल, ग़ज़ल हिंदी जान बाकी है(ग़ज़ल, जिंदगी पर कविता) जज्बातों मे जान बाकी है कलम और तलवार दोनो बाकी है है जिन्हें मंजिलों से इश्क़ उनका अभी इश्क़ होना ही बाकी है जन्नत की खूबसूरती पे क्या कहे उनकी बाहों में जाना बाकी है बेमौसम बोए है अरमानों के बीज अभी इनका पेड़ बनना बाकी हैं इमारतें ही इमारते बन गयी है मेरे शहर में मेरे शहर को, इंसान बनना बाकी हैं इस सोई रात पे गुरुर कैसा अभी दिए को पंक्ति में आना बाकी है वक़्त लौट कर नही आता, ये देखा है वक़्त दोहराता है, ये देखना बाक़ी है jajbaton me jaan baki hai  kalam aur talavar dono baaki hai hai jinhen manjilo se ishq  unaka abhi ishq hona hi baki hai jannat ki khubasurati pe kya kahe unaki bahon mein jana baki hai bemausam boye hai aramano ke beej  abhi inaka ped banna baki hain imarate hi imarate ban gayi hai mere shahar mein  mere shahar ko, insaan banna baki hai is soi raat pe gurur kaisa...