थोड़ा तो हिंदुस्तान मानता होगा (गज़ल)( hindi kavita on majdur)(मज़दूर ग़ज़ल)
कविता, ग़ज़ल, मजदूरों पर ग़ज़ल, जिंदगी पर हिंदी कविता, hindi kavita on life, life poem, life poetry, jindgi ki hakikat, jindgi par hindi kavita संकट की इस घड़ी में जब सारे देशवासी एकजुट होकर महामारी से लड़ने का प्रयास कर रहे थे । तभी कुछ लोग अपनी सामान्य जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हो गए तथा वे खाने की तलाश में, अपने बच्चों को भूखमरी से बचाने के लिए वापिस अपने राज्य, अपने शहर, अपने गांव को लौटने लगे। हमने भारत का सबसे बड़ा अंतरराज्यीय पलायन होते देखा। आजादी के बाद का सबसे बड़ा पलायन हुआ। बहुत से लोगों ने इनकी सहायता की तथा इनको अपने स्थान तक सकुशल पहुंचाने में मदद की। परंतु सियासतदारो का एक तबगा फिर भी राजनीति से बाज नहीं आया और सारी गलती इस हिंदुस्तान पर डाल दी जो दो वक्त की रोटी के लिए सड़कों पर निकल पड़ा था। इन्ही सियासतदारों की हकीकत को बयां करने का प्रयास करती एक कविता। हिंदुस्तान मानता होगा(ज़िन्दगी पर हिंदी कविता, मजदूरों पर ग़ज़ल) वो जब भी खुद के अंदर झाँकता होगा खुद की तस्वीर देखकर काँपता होगा मैं आईना तो नहीं, छाँव भर हुँ वह मुझे थोड़ा तो हिंदुस्तान मानता होगा तू...