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सोचा नहीं था (हिंदी ग़ज़ल, नज़्म))

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सोचा नहीं था (हिंदी ग़ज़ल , हिंदी कविता, नज़्म) तुमसे नजरे मिलेगी सोचा नही था तुमसे मुलाकात होगी सोचा नही था तुमको पसन्द आएंगे सोचा नही था तुम गोद मे सर रखके गाओगे सोचा नही था नजरो के प्यालो से पी रहे है जिस्म धुंआ उगलता है वो बैठे हैं बगल में तीर सीने से निकलता है हल्की कंपकपी में कम्बल खिसक रही है छत रुकी है मुंडेर सरक रही है लफ्जो की सुगबुगाहट में दिल मिल रहे हैं कहने को दो सांसे है  एक हो रही है मुंडेर पे यूँ हाथ मिल जाएंगे सोचा नही था दो कम्बल एक हो जाएंगे सोचा नही था ठंडी राते सावन बन जाएगी सोचा नही था तुम ऐसे सीने लग जाओगी सोचा नही था एक रात में जिंदगी कहदी  जिंदगी भर जो न कह पाए उस एक पल में जिंदगी भर के हसीन पल साथ गुनगुनाये कुछ लफ्जो ने कही कुछ नजरो ने पढ़ी कुछ धड़कनो के मायने सर्द हवा ने समझाये तुम चाँद की तरह छुप जाओगे सोचा नही था तुम आंसू पी जाओगे सोचा नही था बंद आंखों से मुस्कुराओगे सोचा नही था अलविदा कह पाओगे सोचा नही था तुम मिल पाओगे सोचा नही था -सोमेन्द्र सिंह 'सोम'

पत्थरों से इश्क़(हिंदी ग़ज़ल, कविता)

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पत्थरों से इश्क़(ग़ज़ल) संभल के मिले वो, जो कहते हैं जोड़े आसमां में बनते है लगा ऐसा, मिल जाऊँगा धूल के कणों में तूफानों में कुछ कण आसमां भी छुते है इस रोशनी की तलाश में घूमे हम तभी देख, ग़ज़लों में कैसे जुगनू चमकते है कभी खो ना जाए तू रोशनी के अँधियारो में तेरी गली में यादों के आफ़ताब लेके चलते है हो गया है इश्क़ रास्ते के पत्थरों से ये भी देते है दर्द, जब पैरों में चुभते है -सोमेन्द्र सिंह 'सोम'

पिछवाई (ग़ज़ल, हिंदी कविता)

पिछवाई (पश्चिमी हवाएं)(हिंदी कविता) चल रही सांय सांय पवन पिछवाई कुरेदकर दिल को हालत समझाई पिटारा खोला जज्बातों के अक्स पे हमारी मंजूषा ने शब्द लहरी गाई शब्द उतरते नहीं, कलम से अब चूम के इनको आदत नई लगाई  स्याही दर्पण सी, हो गई है अब जिंदगी के पन्नों पे उसकी ही परछाई ज़िस्म फ़रियाद करे नए आगाज-ए-वक़्त का  कहाँ से लाए 'सोम', अब वो हवा पिछवाई सोमेन्द्र सिंह 'सोम'   हिंदी ग़ज़ल संग्रह, ज़िन्दगी पर हिंदी कविता, जीवन पर हिंदी ग़ज़ल, प्रयोगात्मक हिंदी ग़ज़ल यहाँ पढ़े Hindi love sayari अंतिम यात्रा (ज़िन्दगी पर हिंदी कविता)(hindi kavita on life) आपको हमारा ये प्रयास कैसा लगा हमें comment करके बताए। आप हमें कोई सुझाव देना चाहते है तो वो भी हमें mail कर सकते हैं। आपके सुझावों का इन्तज़ार रहेगा। आपके सुझाव ही हमे और अधिक अच्छा लिखने और समझने के लिए प्रेरित करते है। अगर आप अपनी कोई  कविता, ग़ज़ल  या कोई अन्य रचना हमारे ब्लॉग पर लिखना चाहते है तो आप हमें वो रचना अपने नाम के साथ भेज सकते है वो हमारे ' नई कलम ' शीर्षक में आपके नाम के साथ प्रकाशित होगी। आपकी रचनाओं का स्वागत है। आपकी रचनाओ पर...

बेइंतहा ( gazal hindi)

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बेइंतहा रहने दो (ग़ज़ल हिंदी) अपनों को विदा करना, अलविदा कहना कितना मुश्किल है? सबकुछ कहा फिर भी बहुत कुछ बाकी है। इसमें प्यार है, जाने का दर्द है, दर्द में आने वाला गुस्सा है। इस दर्द को जब वह आँखों मे उतारता है और देखता है तो लगता है जैसे आत्मा शरीर से अलग हो रही है, उसके साथ जा रही है। इन्हीं भावनाओं को समेटे एक हिंदी गजल (हिंदी कविता) ग़ज़ल प्यार मोहब्बत ज़िन्दगी बेइंतहा बेइंतहा रहने दो तुम पास ना आओ दूर ही रहने दो यादे लेके तो जा रहे हो अब आँख में आँसू तो रहने दो तुम्हारे दर पर सब खाली है इन गुलों में खुशबू तो रहने दो कल गमेवक्त भी पूछ रहा  मुझमे मोहब्बत तो रहने दो इतनी सजा न दो बेपरवाह रात की बिस्तर में थोड़ी सलवटें तो रहने दो अब आंखे ना मिलाओ सोम से यूँ जिस्म में रूह तो रहने दो  zindagi beintaha beintaha rahane do  tum pas na aao door hi rahane do  yaade leke to ja rahe ho  ab aankh mein aansoo to rahane do tumhare dar par sab khali hai  in gulon mein khushaboo to rahane do  kal gamevakt bhi puchh raha  mujhame mohabbat to rahane do  itani s...

हिंदी ग़ज़ल (hindi gazal)

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यहाँ 10 से अधिक ग़ज़लों का संकलन किया गया है। हिंदी ग़ज़ल   दरबारों से निकल कर आम आदमी के सुख-दुख की हिस्सेदार बनी ग़ज़ल के जब शाब्दिक अर्थ पर जाते है तो आश्चर्य होता है। ग़ज़ल का शाब्दिक अर्थ है औरतों से या औरतों के बारे में बातें करना। विद्वानों का इस बारे में अलग अलग मत है। ग़ज़ल एक ही बार में लिखे हुई शेरों का समूह है जिसमें पहले शेर को मतला कहते हैं अंतिम शेर को मक़्ता कहते हैं। यह शेर एक दूसरे से जुड़े हुए या स्वतंत्र होते हैं। शेरों की यहीं प्रकृति इन्हें बहु आयामी रूप प्रदान करती है। वक्त के साथ-साथ ग़ज़ल के भी अलग-अलग स्वरूप सामने आए, इनकी प्रकृति में भी बदलाव हुआ है। जैसे अरबी ग़ज़ल, फ़ारसी ग़ज़ल, उर्दू ग़ज़ल, हिंदी ग़ज़ल। समकालीन हिंदी ग़ज़ल   समकालीन हिंदी ग़ज़ल समाज में व्याप्त असंतोष, आक्रोश और अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए लड़ते आम आदमी के संजीदा मसलों को समाये हुए है। समकालीन ग़ज़ल सत्ता से बार बार टकराती है, प्रश्न पूछती है।  यह तल्ख़ जमीन पर लिखी हुई है। समसामयिक व समकालीन हिंदी ग़ज़ले आम आदमी के खून पसीने से निकली वह बिजलियां है जो सत्ता के ऊंचे ऊंचे बुर्जों को हिलाने का माद्दा रखत...